Monday, October 17, 2016

नोबेल पुरस्कार विजेता बॉब डीलन



साहित्त वास्तैं इस बह्रे दे नोबेल पुरस्कार विजेता, गायक, गीतकार कने संगीतकार बॉब डीलन (Bob Dylon)  दियाँ दो रचनां

1. The answer is blowin' in the wind  दा प्हाड़ी भासा च अनुवाद:

१. जुआब होआ च तरा दा

माहणू गलाए जाणे ते पैह्ल्लें
जरूरी ऐ  माह्णुएँ  तियें कितणिया  बत्तां जो हँडणा
जरूरी ऐ इक्की  चिटिया फाख्ता तियें कितने समुन्दर तरना
रेत्ता च सोणे  ते पैह्ल्लैं?
म्हेसा तियें रोक्के  जाणे ते पैहल्लें जरूरी ऐ
तोप्फां दे कितने गोळे उड़ाणा ?
जुआब होआ च तरा दा
जुआब मेरे मितरा होआ च तरा दा

हाँ, इक प्हाड़ समुन्दरे च घुळने ते पैह्ल्लें
रे्ह्यी सकदा कितने रोज प्हाड़?
हाँ, अजाद होने दी इजाजत दित्ते जाणे ते पैहल्लें,
कितने साल दुनिया च रैहई सकदे किछ लोक ?
कितनी बरी कोई माह्णू मुंडे ल्होळी सकदा ,
नी दिक्खी सकणे दा नाटक करी ने?
जुआब होआ च तरा दा
जुआब मेरे मितरा होआ च तरा दा

हाँ, कितनी बरी कुसी माहणुएँ तियें
जरूरी ऐ उप्पर दिखणा
गास्से जो दिक्खी सकणे ते पैह्ल्लें?
हाँ, कुसी माहणुए जो कितणे होणे चाह्यी दे कन्न,
जे सैह सुणी सकै लोक्कां जो चींडां मारदे सुणने ते पैह्ललें?
हाँ, हन जरूरी कितणियाँ मौत्तीं
एह जाणने ते पैह्ललें जे मरी चुक्केओ अनगिणत लोक?
जुआब होआ च तरा दा
जुआब मेरे मितरा होआ च तरा दा।

हिंदी अनुवाद:

उत्तर , तैर  रहा है हवा में 

ज़रूरी है कितनी सड़कों पे चलना
एक इन्सान के लिए
इन्सान कहे जाने से पहले
ज़रूरी है एक सफ़ेद फ़ाख़्ता  के लिए कितने समन्दर तैरना
रेत में सोने से पहले?
सदा के लिए प्रतिबन्धित होने से पहले
ज़रूरी है तोपों के कितने गोले उड़ाना?
उत्तर  तैर  रहा है हवा में
उत्तर मेरे साथी तैर  रहा है हवा में

हाँ, एक पर्वत कितने बरस
बना रह सकता है  पर्वत
समन्दर में घुलने से पहले?
हाँ, आज़ाद होने दिए जाने से पहले
कितने बरस दुनिया में रह सकते हैं कुछ लोग?
कितनी बार कोई व्यक्ति हिला सकता है सर
करते हुए,  नहीं देख पाने का अभिनय
उत्तर  तैर  रहा है हवा में
उत्तर मेरे साथी तैर  रहा है हवा में


हाँ, कितनी दफ़ा सर उठाना ज़रूरी है
इन्सान के लिए आकाश को देख पाने से पहले?
हाँ, किसी इन्सान के होने चाहिए कितने कान
इससे पहले कि लोगों को चीखते हुए सुन पाए  वह?
हाँ, ज़रूरी हैं कितनी मौतें
उसके जानने से पहले कि
मर चुके हैं कितने ही लोग
उत्तर  तैर  रहा है हवा में
उत्तर मेरे साथी तैर  रहा है हवा में


The answer is blowin' in the wind

How many roads must a man walk down
Before you call him a man ?
How many seas must a white dove sail
Before she sleeps in the sand ?
Yes, how many times must the cannon balls fly
Before they're forever banned ?
The answer my friend is blowin' in the wind
The answer is blowin' in the wind.

Yes, how many years can a mountain exist
Before it's washed to the sea ?
Yes, how many years can some people exist
Before they're allowed to be free ?
Yes, how many times can a man turn his head
Pretending he just doesn't see ?
The answer my friend is blowin' in the wind
The answer is blowin' in the wind.

Yes, how many times must a man look up
Before he can see the sky ?
Yes, how many ears must one man have
Before he can hear people cry ?
Yes, how many deaths will it take till he knows
That too many people have died ?
The answer my friend is blowin' in the wind
The answer is blowin' in the wind.

अँग्रेजिया ते हिंदिया कने प्हाड़िया च अनुवाद :द्विजेन्द्र द्विज

2. लड़ाइया दे  मालक

ओआ लड़ाइया दे मालको
तुसां ही बणाइयाँ सारियाँ बंदूकाँ

तुसां ही बणायो मौता दे सारे हुआई जाह्ज
तुसां ही बम बणाये
तुसां जेड़े दुआलां पचाहं लुकदे हन
लुकदे फिरदे तुसां तिपाआइया पचाहं
मैं चाहन्दा  कि तुसां जाणी लैह्न
जे मैं तुसां देयाँ मुखोटेयाँ  चिंये दिखी सकदा


तुसां कदी किछ नीं कित्ता कदी
अपर जे भी बणाया सैह वनाश करने ताईं
तुसां मेरिया  दुनिया ने खिलवाड़ करदे रेहंदे
जियां एह तुसां दा छोटा देहया गुड्डा होये
मेरेयाँ  हत्थां च बंदूक पकड़ाई
मेरियाँ  आँखीं ते ओझल होई  गये तुसां
तुसां पिठी दसी सिधी खिट लाई ती
जियां बंदूका दी गोळी

कथां  वाळे जुडास साही
तुसां झूठ बोलदे कनै दिंदै  धोखा
विश्वयुद्ध फतह होई सकदा
ऐह् तुसां भरोसा दुआंदे मिंजो
लेकन मैं तुसां दिया आखीं ते दिखदा
होर मैं तुसां दे दमागे ते दिखदा
जियां पाणिये दे अंदर दिखा दा
पाणी जेड़ा मेरे घरे दे नळके ते बगा दा


तुसां  ट्रिगर करी दितयो तेज
लोक होर तेजिया नें करन फायर
फिरी  तुसां रामे नें बही  मजा लेन्दे
होई जान्दियाँ काफी मौतीं जाह्लु
तुसां अपणियाँ हवेलियाँ च  दड़ी जांदे
नोजुआनाँ दे जिस्मे ते बगदा खून
तिन्हां जो तिस  लाल चिकड़े च दब्बी दिंदा


तुसां  सबनाँ ते  भयानक डर फलायेओ
नीं मिलणी तिन्हा ते  मुक्ति कदी
कि दुनिया च बच्चे नीं ओन
मेरा अणजमया  बे-नाँ शिशु नी ओए इस दुनिया च
तुसां तिसा  खूनें  काबल भी नीं हन
जेड़ा बगदा  तुसां दियाँ  नसां च


मैं जाणदा  जितणा
उझरी उझरी ने बैह्स करना
गलाई सकदे तुसां जे  जुआनिया दे जोशे च
बच्चा है मैं

भले ही तुसां ते छोटा है मैं
अपण इक चीज मैं जाणदा
तिज्जो ईसा ने  भी माफ नीं करना है
तेरियाँ कारगुजारियाँ तियैं


तिजो ने इक सुआल है
क्या तेरी दौलत
तिजो माफी दुआई सकगी?
देहया करी सकगी?े
देहया  लगदा मिंजो है
जाह्लु तेरिया मौता ओणा है प
जितणे पैसे तैं बणायो हन
तिन्हां ने तिजो तेरी आत्मा टाही ने नीं मिलणी है
मिंजो  लगदा कि तैं मरी जाणा
बड़ी जल्दी तेरी  मौत औणी है
मैं तेरे ताबूत कनै चलना है
तिसा मरियल द्पैहरी च

मैं दिखणा है जे जाह्लु तिजो
कबरा च तुआरना है
मैं तेरिया कबरा  पर ताहलु तिकर  खड़ोई रेहणा है
जाह्लु मिंजो जकीन होई जाणा जे तू मरी गिया ।
प्हाड़िया च अनुवाद: कुशल कुमार

युद्ध के मालिक

आओ युद्ध के मालिको
तुमने ही बनायीं सारी बंदूकें
तुमने ही बनाए मौत के सारे हवाई जहाज
तुमने बम बनाए
तुम जो दीवारों के पीछे छिपते हो
छिपते फिरते हो तुम तिपाई के पीछे
मैं चाहता हूँ कि तुम जान लो
कि मैं तुम्हारे मुखौटे से देख सकता हूँ

तुमने कभी कुछ नहीं किया
लेकिन जो भी बनाया वह विनाश के लिए
तुमने मेरी दुनिया से करते हो खिलवाड
जैसे यह तुम्हारा छोटा सा गुड्डा हो
मेरे हाथों में बंदूक थमा कर
मेरी आँख से ओझल हो गये तुम
तुमने पीठ दिखाकर सरपट दौड़ लगा दी
जैसे बंदूक की गोली

किस्सों वाले जुडास की तरह
तुम झूठ बोलते और देते हो धोखा
विश्वयुद्ध फतह किया जा सकता है
ऐसा तुम भरोसा दिलाते हो मुझे
लेकिन मैं तुम्हारी आँखों से देखता हूँ
और मैं तुम्हारे दिमाग़ से देखता हूँ
जैसे मैं पानी के भीतर देखता हूँ
पानी जो मेरे घर की नाली में बहता है

तुमने ट्रिगर कर दिए हैं तेज
लोग और तेजी से करें फायर
फिर तुम आराम से बैठकर मजा लेते हो
काफी हो जाती हैं मौतें जब
तुम अपनी हवेली में दुबक जाते हो
नौजवानों के शरीर से बहता लहू
उन्हें उस लाल कीचड़ में दफ़नाता है

तुमने सबसे भयानक डर फैलाये हैं
नहीं मिलेगी मुक्ति जिनसे कभी
कि दुनिया में बच्चे न आयें
मेरा अजन्मा अनाम शिशु न आये इस दुनिया में
तुम उस खून के काबिल भी नहीं
जो बहता है तुम्हारी नसों में

मैं जानता हूँ जितना
बढ़चढ़ बहस करना
कह सकते हो तुम कि मैं हूँ जवानी के जोश में
नादान हूँ मैं
भले ही तुमसे मैं छोटा हूँ
लेकिन एक चीज मैं जानता हूँ
तुम्हें ईसा भी नहीं करेंगे माफ
तेरी कारगुजारियों के लिए

तुमसे एक सवाल है
क्या तुम्हारी दौलत
तुम्हें माफी दिला सकेगी?
ऐसा कर सकेगी?
ऐसा लगता है मुझे
जब तुम्हारी मौत आएगी
जितना पैसा तुमने बनाया है
उससे तुम अपनी आत्मा वापस नहीं पाओगे
मुझे लगता है कि तुम मरोगे
बहुत जल्द तुम्हारी मौत आएगी
मैं तुम्हारे ताबूत के साथ चलूँगा
उस मरियल दुपहरी में
मैं देखूँगा कि जब तुम
कब्र में उतारे जाओगे
मैं तुम्हारी कब्र पर तब तक रहूँगा खड़ा
कि जब मुझे यकीन हो जाए कि तुम मर गए हो।

हिन्दी में अनुवाद: रमाशंकर सिंह

"Masters Of War"

Come you masters of war
You that build all the guns
You that build the death planes
You that build all the bombs
You that hide behind walls
You that hide behind desks
I just want you to know
I can see through your masks.

You that never done nothin'
But build to destroy
You play with my world
Like it's your little toy
You put a gun in my hand
And you hide from my eyes
And you turn and run farther
When the fast bullets fly.

Like Judas of old
You lie and deceive
A world war can be won
You want me to believe
But I see through your eyes
And I see through your brain
Like I see through the water
That runs down my drain.

You fasten all the triggers
For the others to fire
Then you set back and watch
When the death count gets higher
You hide in your mansion'
As young people's blood
Flows out of their bodies
And is buried in the mud.

You've thrown the worst fear
That can ever be hurled
Fear to bring children
Into the world
For threatening my baby
Unborn and unnamed
You ain't worth the blood
That runs in your veins.

How much do I know
To talk out of turn
You might say that I'm young
You might say I'm unlearned
But there's one thing I know
Though I'm younger than you
That even Jesus would never
Forgive what you do.

Let me ask you one question
Is your money that good
Will it buy you forgiveness
Do you think that it could
I think you will find
When your death takes its toll
All the money you made
Will never buy back your soul.

And I hope that you die
And your death'll come soon
I will follow your casket
In the pale afternoon
And I'll watch while you're lowered
Down to your deathbed
And I'll stand over your grave
'Til I'm sure that you're dead.

Bob Dylon

Friday, September 23, 2016

असां, तुसां कनैै पहाड़ी

पहाड़ी भाषा दे बारे च लखारी बिच बिच चर्चा करदे ई रैह्ंदे। 
कई मसले ऐसे हन जिन्‍हां दे बारे च बड़ा घचोळ पेया है। 
बड्डा मसला है कुण बोली, कुती दी बोली ? व्‍याकरण कनै लिपि दे सुआल भी खड़ोंदे रैह्ंदे। 
इस बारे च पढ़ा नौजवान कवि भूपेंद्र भूपी जमवाल होरां दे वचार।  

जित्थू तिकर अपणी गल्ल कुसी जो दसणे दा सवाल है, सबनां जो भाषा या बोलिया दी ज़रूरत मसूस हुन्दीकने असां हिमाचलियां जो जिसा भाषा दी दिले ते ज़रूरत लगदी सैह  है-- पहाड़ी । पर  इक्क सवाल हल्ली भी हल नी होया जे इस प्रदेशे दी सरकारी कमकाज कने पढ़ाइया-लखाइया दी भाषा एह काहलू बणगी! हिमाचले दे साहित्यकार , कलाप्रेमी, कने संस्कृति दे राखे केइयां बर्हेयां ते कोशिश करादे जे अपणिया भाषा जो किहियां बचाइये।अज हालत एह है कि असां अपणेयां बच्चेयाँ जो भी पहाड़ी नी सखालदे। मते सारे लफ्ज़ गवाची ही गे।जे इहियां ही रेह्या तां क्या एह भाषा हौले-हौले मुकी जांगी? प्रदेश दे बुद्धिजीवी जेहड़ियां कोशिशां करादे सैह बेकार चली जांगियां? हल्ली जे ,अज्ज भी मते सारे माहणू ऐसे हैन जेह्ड़े अपणिया बोलिया ताईं डुग्गी पीड़ बुझदे।

मुस्कल एह भी आई जांदी जे पहाड़ी कुसा बोलिया जो मन्निए? कांगड़ी? चम्बियाली? कुलवीमण्डियाली? कहलूरी? बघाटी?   महासुवी? सिरमौरी?? आखर कुसजो मानक लेई के चल्लिए?इक शुद्ध विन्यास कने व्याकरण दी ज़रूरत सांजो पौणी है। इस वास्ते इक ऐसी बोली चुंणना पौणी जिसा जो सबते जादा ग्लाया, समझेया जाँदा होएं। हुण , कांगड़ी इक ऐसी बोली है जिसा जो पूरे हिमाचल प्रदेश विच सारेयां ते ज़ादा यानि कि लगभग चाळी फ़ीसदी ते भी ज़्यादा हिमाचली ग्लांदे जाणदे कने समझदे हैन। जोगिन्द्रनगर सीमा ते लेई के पठानकोट सीमा , कने चुवाड़ी ते घुमारवीं सीमा तिकर बड़े बड्डे क्षेत्र च विच इसा दा फलाव है। अगर इसा बोलिया जो शुद्ध मानक मन्नी करी होरणी सारियां बोलियाँ दे लफ्ज़ इस च खुल्ले तौर पर शामल करी दित्ते जाह्न तां एह मुस्कल भी दूर होई जाणी। इसा गल्ला पर प्रदेश दे लग्ग लग्ग हिस्सेयां च रेहणे वाले बुद्धिजीवियाँ भी हामी भरियो है। इस विच माड़ी मोटी दिक़्क़त किन्नौर कने लाहौल-स्पीती वालेयां जो रेही सकदी।  बाकी पूरे प्रदेश विच असां अरामे कन्ने इक्की दूइया बोलिया देयाँ लफ़्ज़ां जो समझी ही लैंदे हैन।  भाषा कने शब्द-भण्डार दे मामले विच कुछ क़ुर्बानियाँ भी देणा पेई सकदियाँ । जाहलू असां कोई मिट्ठेयां फलां वाला रुक्ख लगांदे तां निकेयां निकेयां बूटेयां कने घाए पट्ठे जो अपणा वजूद गवाणा ही पौंदा  है।        

जाहलू गल्ल पहाड़ी भाषा दी  औंदी तां इक्क पेच होर फसदा और सैह पेच है लिपिया दा। असां सारे ही जाणदे हैन जे पहाड़ी रियासतां दी लिपि टाकरी रेहियो। पुराणे ग्रन्थ, हसाब-कताब सब इसा ही लिपिया विच मिलदे।पर अज्ज टाकरी जाणने वाले गिणुएं ही हैन बचेयो। कुछना संस्कृति देयां सच्चेयां सपाहियां हिम्मत नी छड्डी कने टाकरी जो दोबारा सारेयां साह्मणे ल्योंदा । एह सच्ची मुच्ची इक बड्डी क़ामयाबी है । कैंह जे कुसी वक़्त पर प्शावर ते लेई के नेपाल देयां पहाड़ां तिकर एही लिपि इस्तेमाल हुन्दी थी। अज्ज कोई भी पहाड़ी प्रदेश इसा लिपिया दा प्रयोग नी करादा। बक्खे दे ही प्रदेश जम्मू कश्मीर जो लेई लेया।इत्थू दी डोगरी बोली अज्ज भाषा दा दर्जा लेई बैठियो पर इसाजो देवनागरी विच ही लिखेया जाँदा है। असां दे साहित्यकार भी अज्जे तिकर  देवनागरी दे ही सहारें चलदे आए हैन। ऐसे वक़्त विच जे असां ग्लाण जे हुण असां पहाड़ी टाकरी च ही लिखणी तां मैं समझदा एह कोई फायदे वाळी गल्ल नी हुणी। असां पहाड़ी दी तरक़्क़ी विच पहलें ही बड़े रोड़े बछायो हैन।इसा जो होर ज़ादा करड़ा नी बणाणा ।पुराणा साहित्य भी पढ़ना, टाकरी भी सिखणी ;अपणी संस्कृति भी बचाणी पर नोएं साहित्य वास्ते एहड़े बह्नण नी पाणे जे लिखणा ही मुस्कल होई जाएं। इस वक़्त इक्क सर्वसांझे हल दी ही ज़रूरत है। अज्ज जिसा तौळा कन्ने पहाड़ी दा शब्द भण्डार घटा करदा है,एह ही हाल रेह्या तां इक दिन एह भाषा भी सिर्फ इतिहास ही बणी के रेही जाणी। फिरी काहल्की लोक्कां कताबाँ च ही पढ़ना कि पहाड़ी भी कोई भाषा थी।      

जितने मठैह्ने खुणगे उतनी पोल ही पौणी, मिलणा कख नी। इस वक़्त सांजो ज़रूरत है इकजुट होई के कम्म करने दी , किट्ठेयां होई के सोचणे कने अग्गे बधणे दी , तां जे असां पहाड़ी भाषा जो सैह जगह दुआई सकिए जिसा दी एह हक़दार है। जे असां तुसां सारे हिमाचल वासी मिली के कोशिश करगे तां सैह ध्याड़ा दूर नी है जाहलू पहाड़ी सरकारी कम्मेकाजे कने पढ़ाइया दे इक्की विषय दे रूप च नजरी औणी।

Sunday, September 18, 2016

तितरे दी पूछ

सलमान मासाल्‍हा


सलमान माासाल्‍हा हिब्रू कनै अरबी दूईं जबानां च लिखणे आळा हिब्रू कवि है। 
मैं इन्‍हां दियां कुछ कवतां दा अंग्रेजिया ते हिंदिया च अनुवाद कीत्‍तेया। 
तिन्‍हां चा ते इक्‍की कवता दा तेज सेठी भाई होरां प्‍हाड़िया च अनुवाद करी ता।
 इस अनुवादे दा नंद तुहां भी लेया। 
दयारे दिया रीता जो कायम रखदेयां होयां प्‍हाड़ी हिंदी कनै अंग्रेजी तिन्‍नो रूप तुहां पढ़ा। 



तितरे दी पूछ

मेरेयां लिब्बड़ां च है इक्क छड्डे:या वतन

अपणेयाँ मूँहन्डेयाँ ते झाड़दा कणका दीयां बाळीयाँ

सै: जे सच्चीय्यीयाँ ति:दे सिरे देयाँ बाळां नै

जैतून्ना देयाँ झुड़ेयाँ च

किरसाण यादां दे हळ बाह्न्दा

कनै वसारी छड्डदा जंगलां देयाँ पंछीयाँ दी तांह्ग

अन्ने देयाँ दाणेयाँ दी खातिर

प्हाड़ी गोलमटोळ पत्थराँ दीयां ह्थ्याळीयाँ प्राह्लैं

टपकण भ्यागसारे दे बद्दळ

रिढ़ियाँ नै चारसूं जकोह्यो

शकारी आत्मसमरपणे ते मना: करदा

गुद्दड़गाळ्याँ नै भरेह्या अपणा झोळा

कनै हड़ोस्सदा तिस्च तितरे दीया पूच्छा

जां जे लोक समझी जाह्न

भई सै: है जबरजस्त शकारी।

प्‍हाड़ी अनुवाद : तेज कुमार सेठी  


तीतर की पूंछ
मेरे होठों में है एक छोड़ा हुआ वतन
अपने कंधों से झाड़ता गेहूं की बालियां
जो चिपक गईं उसके सिर के बालों से
जैतून के झुरमुट में
किसान यादों का हल चलाता है
और बिसर जाता है जंगली पंछियों की आरजू
अन्‍न के दानों के लिए
पहाड़ी गोल पत्‍थरों की हथेलियों पर
टपके भोर के बादल
पहाड़ियों से चारसूं दबे हुए
शिकारी आत्‍मसमर्पण से मना करता है
गूदडो़ं से भर लेता है अपना झोला
और खोंसता है उसमें तीतर की पूंछ
ताकि लोग समझ जाएं
वो है जबरदस्‍त शिकारी।
हिंदी अनुवाद : अनूप सेठी 



PARTRIDGE TAIL

In my lips an abandoned homeland.
Shaking grains of wheat from her shoulders
that stuck to hairs of her head.

Among the olive groves
the peasant draws furrows of memory.
And forgets the longing of the wild birds
for grain.

On the palms of the mountain boulders
the morning clouds dripped
pressed from all sides by the hills.

The hunter, refusing to surrender,
fills his bag with ragged clothes.
And sticks a partridge tail among them
so people will know
that he is an excellent hunter.
Poem by Salman Masalha, translated by Vivian Eden
 

Friday, September 2, 2016

लखारिए दा पुनर्जन्म


दिसंबर 2014 च तमिल लखारी पेरूमल मुरुगन जो अपणे उपन्यास ‘मथोरुभागन’ तियें जान्नी ते मारने दी धमकी मिल्ली थी  । जिसते बाद, जात-पात कने धर्मे दे  नायें  पर तिह्नाँ दियाँ कताब्बाँ फूकियाँ गेइयाँ । पुलिस केस भी कित्ता गेया। मुरुगन ने अप्पुँ जो  को घरे दियाँ दुआल्लाँ च हुड़ी पाया   कने लखारियें बिरोध च गलाया:“मरी गेया लखारी पेरूमल मुरुगन।”

पिछले महीने मद्रास हाई कोर्ट च तिह्नाँ दिया  कताब्बा  पर लगियो रोक पर सुणवाई थी। कोर्ट ने गलाया “कताब्बा च  ऐसा किछ नीं  ऐ, जिस दिया बज्हा ने मुरुगन जो लिखणे ते रोक्या जाये । लखारी मुरुगन जो डरना नीं चाह्यी दा, लिखणा चाह्यी दा..अपणे लिखणे दा विस्तार होर बधाणाँ चाह्यी दा।  लोक तिह्नाँ दे लिखणे दे तरीक्के ने बह्णी सैहमत नीं होन , मुरुगन जो साहित दे खेत्तर च अपणा योगदान रोकणा नीं चाह्यी दा।’

कने फिरी , उनियाँ म्हीनेयाँ बाद पेरूमल मुरुगन ने अपणी  चुप्प तोड़ी। एह लखारिए दा पुनर्जन्म था । कोर्ट दे फैसले दे बाद, मुरुगन अपणियाँ 200 नौंइयाँ कवताँ दी कताब लेई ने आये हन।  कताब्बा दा नां ऐ : ओरु कोज़ाइयिन पादलकल मतलब इक्की डर्पोक्के दा गीत (A Coward’s Song)  अंग्रेजिया च अनुवाद अनिरुद्ध वासुदेवन जी  ने कित्तेया|  22 अगस्त को दिल्ली च मुरुगन दिया कताब्बा दा लोकार्पण होया। तिह्नाँ लिखेया: ’मिंजो बझोआ दा जे अन्दरैं-अंदर किछकी होआ दा  था जिसदिया बज्हा ने मैं इह्याँ लिखी सकेया ।  मेरिया कताब्बा  पर रोक लगणे दे तिन्नाँ म्हीन्नेयाँ बाद मैं किछ भी नीं लिखेया था। इह्याँ लग्गा दा था जीह्याँ मेरियाँ  उंगळियाँ सुन्न होई  गेइयाँ थियाँ । मैं पढ़ी लिखी नीं सका दा था। फरवरी 2015 च  मैं अपणियाँ मुनियाँ  ने  मिलणा मदुरई गेया। मैं अपणे मितरे दे घरैं ठैहरेया था। दो कमरे थे, इक्की च कताब्बाँ भरोइयाँ थियाँ ,  इक्की च पळंग था। पैहले किछ रोज मैं पळंगे च पेई रेह्या , थोड़ेयाँ रोज्जाँ  बाद इह्याँ लग्गा  जीह्याँ  नदिया च फाण आया कने  बह्न्न  टुटी गेया। मैं लिखणा शुरू कित्ता कने रुकेया नीं। इक्की डरपोक्के दा गीत दा जन्म इह्याँ होया।”
पेरुमल मुरुगन
दिया कवता दा
अँग्रेजिया ते प्हाड़ी अनुवाद: द्विजेन्द्र द्विज

डर्पोक्के दा गीत

बिपता नीं  पोंदी
कुसी जो
डर्पोक्के दिया  बह्जा ते
दंगे नीं भड़कदे कुथी भी
डरपोक्के दिया  बह्जा ते
बरबाद नीं होई जांदा किछ भी
डर्पोक्के दिया  बह्जा ते

डर्पोक 
नीं खींजदा अपणीं तलुआर
जां ताणदा  तिसा
 कुसी रुक्खे पर 
पर्खणे तियें तिसा दी धार
कैंह, डरपोक्के वाह्ळ ता
 हुन्दी इ नीं तलुआर

डर्पोक
कुसी जो डरांदा इ नीं

कुदरत सुआगत करदी
डर्पोक्के दा
सैह नीं मुर्कदा इक भी पत्तर
जां तोड़दा
इक भी फुल्ल

कुदरत 
छातिया ने लांदी डर्पोक्के जो
मां मूड़ैं लैन्दी डरेयो
यांणे जो, कने
 प्यान्दी अपणा दुद्ध

कुदरत हार पुआंदी
डर्पोक्के जो
कैंह जे सैह निकळदा  
 घरे ते बाह्र
भरने तियें सिर्फ 
अपणाँ पेट
अन्दर इ रैह्न्दा सैह
कने रैह्न्दा 
झँझटाँ ते दूर
डर्पोक्के तियें मुस्कल हुंदा
 रैह्णा बज्झी नैं
सैह करदा रैह्न्दा साफ
कूणाँ

डर्पोक 
नीं मिलदा 
खेल्लाँ दे मदान्ने च
सैह नीं
भड़कांदा 
भीड़ा जो
नफरता च गच्च 
राष्ट्रबादी पागलपणें तियें

डर्पोक
शामल नीं हुंदा
कुसी राजनीतिक पार्टिया च 
नीं चलदा 
कुसी विचारधारा कने
नीं हुंदा भगत 
कुसी नेते दा

डर्पोक
नीं बणाई सकदा
सुआगती मस्हूरी
नीं सट्टी सकदा दुद्ध
बड्डेयाँ बैनराँ पर
नीं बजाई सकदा
 स्प्पड़-सींढाँ, 
नीं दुड़की सकदा
नीं जांदा जलूस्साँ च

डर्पोक
नीं कर्दा कुसी दैं चोरी
नीं रोकदा तिसदियाँ 
चीज्जाँ लुटणाँ आह्याँ जो

डर्पोक
नीं कर्दा कोस्त कुसी दा ’रेप’
कर्ने दी
सैह नीं दिखी सकदा 
कुसी जो चोर-नजराँ नें

डर्पोक
कदी नीं बणदा खून्नी
हाँ सैह सोचदा 
आत्महत्या कर्ने बारे
कने करी भी लैन्दा।

A Coward’s Song

Perumal Murugan

Misery befalls no one
because of a coward
Riots break out nowhere
because of a coward
Nothing gets destroyed
because of a coward

A coward
does not draw his sword
or aim it at a tree
to check its sharpness
Why, a coward has no sword
to begin with

A coward
causes no one to feel fear

A coward
fears darkness
Songs come forth from him

Nature welcomes
a coward
He doesn’t pinch away a leaf
or pluck a flower

Nature embraces
a coward
A mother gathers a terrified child 
and suckles it

Nature garlands
a coward
For he steps out only 
to feed himself
He stays in and
keeps out of trouble

A coward 
also finds it hard 
to stay confined
He keeps cleaning up
nooks and corners

You won’t find a coward
in a playground
He never rouses crowds
into hateful nationalist frenzy

A coward 
joins no political party,
abides by no ideology,
and is loyal to no leader

A coward
cannot prepare a welcome flyer 
he cannot pour milk over big banners
he simply cannot whistle, prance about,
and go out in processions

A coward
steals from no one
he doesn’t stop those
who come to take away this things

A coward
does not attempt to rape anyone
he cannot even look in stealth
at another’s body

A coward
never turns into a murderer
However
He thinks about suicide
and does it, too.


Title Poem
From
Oru Kozhaiyin Paadalkal
Translated into English by Aniruddha Vasudevan                         

अडियां

(तुआं कवि पवन करण होरां दी इक कविता 'एड़ियां' सुज्‍झी। पेस है अनुवादे दी कोसिस)

__________
अडियां
___________
असां जाह्लू बी सौग्‍गी-सौग्‍गी
पैडि़यां गोहंदे, मैं पैहलैं तिज्‍जो गलांदा
पैडि़यां गोहणे जो
तू भचक होई नै पुछदी, कैंह
तैं नी चलणा मिंजो कन्‍नैं
मैं तिज्‍जो गलांदा
तू गोह् तां सही, मैं बी औंदा
कनैं मैं बुह्र रुकी करी
पैडि़यां गोहंदेयां तेरेआं पैरां दीयां
चिटियां-चरेलियां अडियां दिखदा रैहंदा
जाह्रू तू सयाले दे धुप्‍पे च
पत्‍थरे नै रगड़ी-रगड़ी करी
अपणियां अडियां धोंदी
मैं तिज्‍जो चघाई नैं गलांदा
इन्‍नी पत्‍थरैं तेरियां अडियां नीं चमकाइयां
अपर तेरियां अडियां
इस पथरे जो
घरीसी-घरीसी करी चमकाई सट्टेया
कदीं कदांईं तूं इन्‍हां पर
लाई लैंदी लालखड़ा रंग
तां मैं तिज्‍जो टोकदा
मीये तैं इतणियां छैल़ अडियां
कजो रंगी चकाइयां
मैं कितणी बरी गलाया
भई तेरियां अडियां तिन्‍हां अडियां चा नी हन
जेहडि़यां लालखड़े रंगे ताईं बणियां हुंदियां
असां मते ठैहरी करी मिल्‍ले
असां पैहले ई मिल्‍लयों हुंदे तां मैं
तेरियां इन्‍हां अडियां जो
तिज्‍जो पींघ झटांदेयां
अप्‍पू ते दूर जांदेयां
नेड़ैं औंदेयां भी दिखया होणा था
इतणा ही नीं, मैं
पंजेयां दैं भारैं
रस्सिया कुददिया बेला
लाल फिरने आलि़यां
तेरियां इन्‍हां अडियां च
घटे ते घट इक बरी ता
अपणा गिटुए साहई चुभणा
जरूर मसूस कित्‍तेया हुंदा।
(कविता : पवन करण, कांगड़ी हिमाचली में अनुवाद का प्रयास : नवनीत शर्मा)
.............................
(मूल कविता)
एड़ियां
हम जब भी साथ-साथ
सीढि़यां चढ़ते, मैं पहले तुमसे
सीढि़यां चढ़ने की कहता
तुम चौककर पूछतीं क्यों
क्या तुम मेरे साथ नहीं चलोगे,
मैं तुमसे कहता
तुम चढो तो सही, मैं आता हूं
और मैं नीचे रूककर
जीने चढ़तीं तुम्हारे पैरों की
उजलीं एड़ियां देखता
जब तुम सर्दियों की धूप में
पत्थर से रगड़-रगड़कर
अपनी एड़ियां धोतीं
तुम्हें चिढ़आते हुए मैं कहता
इस पत्थर ने
तुम्हारी एड़ियों को
नहीं चमकाया
बल्कि तुम्हारी एड़ियों ने
घिस-घिसकर इस पत्थर को
चमका डाला है
कभी-कभार तुम इन पर
महावर लगा लेतीं
तो मैं तुम्हें टोकता
अरे यार तुमने
इतनी सुंदर एड़ियों को
क्यों रंग डाला
कितनी बार कहा है
कि तुम्हारी एड़ियां
उन एड़ियों में से नहीं
जो महावर के लिये बनी होती हैं
हम बहुत बाद में मिले
हम पहले मिले होते तो मैेंने
तुम्हारीं इन एड़ियों को
तुम्हें झूला झुलाते हुए
अपने से दूर जाते
और पास आते भी देखा होता
इतना ही नहीं मैंने
पंजों के बल
रस्सी कूदते समय
लाल पड़ जाने वालीं
तुम्हारी इन एड़ियों में
कम से कम एक बार तो
अपना कंकर की तरह चुभना
जरूर महसूस किया होता ।
-पवन करण

Tuesday, May 17, 2016

बॉब ईटन: इक्क अमेरिकी पहाड़िया







  कुछ साल पहलें इक्की अख़बारे विच पढ़ेया था कि पालमपुर विच 5-6 साल तिकर रेह्यी के इक्क अमेरिकन कांगड़ी व्याकरण कने उच्चारण उप्पर शोध करना आया है ।  तिस कन्ने कोई अंग्रेज़ी या हिंदी विच ग्लांदा तां सैह पुच्छदा , कि तुसां पहाड़ी नी ग्लांदे? जाह्लू एह गल्ल मैं पढ़ी तां दिल कित्ता कि इस महानुभाव कन्ने मिली के अपणिया बोलिया जो अग्गें बधाणे दी प्रेरणा मिली सकदी। पर कुछ निजी कारणां करी के एह कम्म सिरे नी चढ़ी पाया। वक़्त गुजरदा रेह्या। केई बरी हालात ही एह्ड़े होई जांदे । सैह गल्ल आई-गेई होई गेई। हौळें-हौळें अमेरिका वाळे सज्जणे दा नां भी भुली गेया। बड़ी कोशस कित्ती कि नां याद औएं तां तिस महान् आदमिए कन्ने मिलिए या कोई सलाह मशवरा करिए, पर जाह्लू नां ही याद नी तां क्या करना! गूगल चाचुए वाह्ल भी मतळाक्के मारे पर कोई गल्ल बणी नी । खैर, अपणिया बोलिया ताईं धीड़ लगाई छड्डी । केई लोक मिलदे-जुलदेयां वचारां वाळे मिलणा लग्गे तां फिरी हौसला बद्धदा रेह्या। 

सोशल मीडिया दा ज़माना है; द्विजेन्द्र द्विज होरां इक्क व्हाट्सएप्प ग्रुप 'पहाड़ी पंची' विच जुड़वाया , जिसदे संचालक कुशल कुमार होरां पहाड़ी भाषा जो उप्पर चुक्कणे ताईं मतेयां बुद्धिजीवियां जो जोड़ी के रक्खेया है । इसी ग्रुप विच बिलासपुर दे लोकगवैये बलदेव सांख्यायन होरां भी हैन । बलदेव होरां इक्क ध्याड़ा अख़बारा दी सैह ही कटिंग ग्रुप विच पोस्ट करी दित्ती। बस! होई गेया कम्म ! जिस बन्दे दा नां ही भुली चुक्केया था, पर मिलणे दी काहळी मने ही मने विच मचिओ थी, तिसदा पता लगाणे दी बत्त लग्गी दुसणा ! बलदेव होरां दिया इक्की पोस्टा सारा कम्म आसान करी दित्ता । तिस ध्याड़े पूरा दिन इंटरनेट दा सहारा लेई के संझा तिकर न सिर्फ बॉब ईटन होरां दे बारे विच काफ़ी जानकारी हत्थें लग्गी , बल्कि तिह्नां दी थीसिस  भी मिली गेई । दूए दिन भ्यागा तिकर बॉब ईटन होरां कने  सोशल मीडिया पर ही गल्लबात भी शुरू होई गेई। अपणिया ही बोलिया विच तिह्नां दे जवाब पढ़ी के इतणी ख़ुशी होई कि पुच्छा मत। एह गल्ल जाह्लू मैं राजीव त्रिगर्ती होरां कन्ने बाकी पहाड़ी साथियां कन्ने दस्सी तां सैह भी बड़े खुश होए। 
        
बॉब ईटन यानिकि डॉ. रॉबर्ट डी. ईटन होरां जो अपणियां कुछ गल्लां दस्सियां , कुछ तिह्नां दियां सुणियां । हौळें-हौळें केइयां गल्लां पर वचार साँझा होए। राजीव त्रिगर्ती होरां दे कम्मे दे बारे विच कन्ने अपणे इकअद्धे लेख दे बारे विच मैं तिह्नां जो दस्सेया। राजीव त्रिगर्ती होरां दा पहाड़ी भाषा उप्पर लिखेया बड़ा लम्मा लेख है, जेहड़ा अपणे आपे विच कुसी शोधपत्र ते घट्ट नी है।
         
    इस वक़्त तिकर मिंजो एह पता नी था कि डॉ. ईटन हिंदुस्तान विच आयो हैन अज्जकल। पर तधेयाड़ी गप्पां-गप्पां विच पता लग्गा कि सैह जम्मू-कश्मीर दे ऊधमपुर विच डोगरी भाषा पर कम्म लगेओ अज्जकल करना। बस! फिरी त्रिगर्ती होरां कन्ने सलाह करी के असां मिलणे दी अड़ी पाई दित्ती। तिह्नां दे सहयोगी पवन होरां कने गल्लबात करने परन्त एह फ़ैसला होया कि वापस अमेरिका जाणे ते पहलें मिलणे दा कुछ सोचेया जाई सकदा। 
       
       12 अप्रैल 2016 जो पवन होरां दा फ़ोन आया कि बॉब अज्जकी रात कांगड़ा औआ करदे। अपणी उलझियो स्थिति विच भी मैं एह मौक़ा गवांणा नी चाहन्दा था, झट त्रिगर्ती होरां जो ग्लाया कने असां तिह्नां दे होटल विच जाई पुज्जे। बड़े ही शांत स्भाबे दे लम्मे-झम्मे बॉब आए कने असां दी गल्लबात शुरू होई। पवन कौंडल कने कर्ण डोगरा होरां तिह्नां सौग्गी थे। वाकफियत ते बाद गल्लबात होई जिसादे कुछ हिस्से एह हैन :

मैं : डॉ. ईटन, सबते पहलें तां एह दस्सा कि दुनिया दियां इतनियां भाषां छड्डी के तुसां शोध ताईं कांगड़ी ही कजो चुणी ?

बॉब :  मेरे इक्की साथिएं सलाह दित्ती जे कुसी विदेशी भाषा जो सिक्खी करी तिसा भाषा पर रिसर्च कर ।मैं हिंदुस्तान विच आई के भाषां दे बारे विच लगा पढ़ना। मसूरी आई के हिंदी सिक्खी कने 'लग्ग-'लग्ग भाषां पर छपियां सर्वे-रिपोर्ट्स पढ़ियां । पढ़दे-पढ़दे जाह्लू मैं कांगड़ी दे बारे विच पढ़ेया तां इसा भाषा विच मिंजो क़ाफ़ी कुछ ऐसा मिल्ला , जेह्ड़ा मिंजो चाहिदा था। इतणे लोक इसा भाषा जो ग्लाणे-समझणे वाळे हैन  पर फिरी भी भाषा पर जादा कम्म नी होया था । बस, एही सोची के मैं कांगड़ी पर कम्म करने दी सोची कने आई गेआ इत्थू । दूआ इसा भाषा जो न सिर्फ लगभग  पूरे हिमाचल विच बल्कि अक्खे-बक्खे देयां प्रदेशां विच भी समझेया-ग्लाया जाँदा है ।

मैं : पहली बरी कदेह्या लग्गा इत्थू आई के?
बॉब: राती दस बजे पालमपुर पुज्जा। बस अड्डे बक्खे इक्की होटल विच रुकेया। जाह्लू भ्यागा सूरज निक्ळेआ कने बाहरे दा नज़ारा दिक्खेया , तां मज़ा ही आई गेया। सामणे धौलाधार इतणी प्यारी लग्गा करदी थी कि पुच्छा ही मत। मैं सोची लेया बस इस ही ख़ूबसूरत 'लाक्के दी भाषा सिक्खणा चाहिदी। पवन कने गल्ल कित्ती एह हर हफ़्ते आई के स्खाणा लग्गे। हौळें-हौळें इत्थू देयां मित्रां दे सम्पर्क विच आई के कांगड़ी सखोई गेई।

राजीव : क्या ख़ास लग्गा इसा भाषा विच तुसां जो?
बॉब : कांगड़ी इक्क ऐसी भाषा है , जेह्ड़ी पहाड़े दे बड़े बड्डे हिस्से विच ग्लाई जांदी, पर इक्क गल्ल एह ख़ास है जे इसा भाषा जो नूरपुर दे 'लाक्के विच होरसी तरीक़े कने टोन लगाई के बोल्लेया जाँदा तां हमीरपुर दे 'लाक्के विच होरसी तरीक़े 'ने। ख़ैर पहाड़ां विच वैसे भी खड्ड टप्पदे कने भाषा दा रूप बदलोई जाँदा।

राजीव : ऐसी गल्ल नी है कि कांगड़ी कने बाकी पहाड़ी भाषां या बोलियाँ पर कम्म नी होया। मते विद्वान कम्म करदे आए पर हल्ली भी कांगड़ी भाषा जो आधिकारिक दर्जा नी मिल्ली पाया । क्या कारण लगदा इसदा तुसां जो?
बॉब: दिक्खा , भाषा दी तरक़्क़ी सिर्फ विद्वानां देयां कम्माँ कने ही नी हुन्दी। तिह्नां कम्माँ जो आम लोक्कां तिकर पुजाणा बड़ा ज़रूरी हुँदा। असां दे लोक जागरूक नी हैन , तां कम्म बड़ा मुश्कल है । या फिरी सरकारी तन्त्र कने राजनैतिक लोक अगर चाह्न , तां कुछ होई सकदा । केई बरी तां ऐसियां भी भाषां जो 'लग्ग-'लग्ग दर्जा मिल्लेया , जिह्नां विच कोई फ़र्क़ ही नी हुँदा।

मैं : जी , जिहियां उर्दू कने हिंदी भाषा हैन।
बॉब : हाँ जी , भाषा सेना कने बणदी । जिसा बोलिया वल्ल  सेना थी , सैह भाषा बणी गेई । अपणी अपणी सेना होए तां अपणी अपणी भाषा बणी जांदी। हा हा हा !

मैं : हाँ जी, सच ग्लाया । काश  ! असां दे भी सपाही जागी पौह्न , सोचन अपणिया भाषा दे बारे विच कने ..... । त्रिगर्ती होरां काफ़ी विस्तार विच पहाड़ी भाषा कने इत्थू दियां बोलियाँ उप्पर लिखेया है । होर भी मते लोक हैन जेहड़े कम्में लग्गेयो पर इक्क दिशा दी ज़रूरत है ।
राजीव : जी कांगड़ी पर जेह्ड़ी तुसां रिसर्च कित्तियो तिसादे मुताबक तुसां भटेआळी जो 'लग्ग मन्नेया , पर भटेआळी तां पूरी तरह कांगड़ी ही है। चुवाड़ी ते गांह दी बोली ज़रूर 'लग्ग है । इक्क गल्ल होर पुच्छणी थी , तुसां जो क्या लग्गदा , क्या पूरे हिमाचल ताईं कोई इक्क भाषा ठीक रेह्यी सकदी ?
बॉब : पूरे हिमाचल विच इक्क भाषा दी कल्पना करना मेरे ह्साबे 'ने थोड़ा औक्खा है । मैं मण्डी गेआ तां तित्थू दे कुछ शब्द कांगड़ी ते बिल्कुल 'लग्ग लग्गे । कुथी-कुथी तां वाक्य दा रूप भी लाह्दा है । मंडयाळी , चम्बेआळी तां मिलदियां-जुलदियां भी  हैन पर सिरमौरी , महासुवी वगैरह दा तां  बड़ा ही ज़्यादा फ़र्क़ है । 

राजीव : दिक्खा , अज्जकल लोक अपणेयां बच्चेयाँ कने अपणी भाषा नी बोलदे । हिंदी भी नी बल्कि अंग्रेजी मीडियम विच बच्चे पढ़ा 'दे । किहियाँ सेना बणनी , काहलू सिखगे बच्चे अपणिया मातृभाषा जो?
बॉब : बच्चे दा सिद्धा सम्पर्क माऊ  कने हुँदा माऊं जो चाहिदा सैह अपणी बोलीअपणी भाषा सखाह्न बच्चे जो ।

मैं : हाँ जी । जे असां बच्चे जो फ़िफ्टी फ़ाइव दस्सा 'दे तां पचपन भी दसणा ज़रूरी है कने पचूँजा भी !  
राजीव : अंग्रेज़ी मेरिया समझा विच इक्क ऐसी भाषा है जेहड़ी होरना भाषां जो मारी दिन्दी । अंग्रेज़िया पिच्छेँ नह्स्सणा कितणा कि फायदेमंद है ?
बॉब : असां जो समझणा चाहिदा जे अंग्रेज़ी असां जो दो पीढिआं ते बाद कुछ नी देई सकदी । अज्ज अंग्रेज़िया दिया वजह ने जे असां अपणिया भाषां छड्डा 'दे पर कल जाह्लू अंग्रेजिया भी रोटी देणे लायक नी रैह्णा  कने अपणी भाषा भी नी औणी ता फिरी कुथू जो जाणा?

मैं : सोळा आन्ने सच है । बगानिया चमका दिक्खी अपणे टप्परू कजो फूकी देणे । अच्छा , तुसां क्या सुनेहा दैणा चाहन्दे इत्थू देयां लोक्कां जो?
बॉब : सबते ज़्यादा ज़रूरी है अपणिया भाषा विच गल्ल करना , अपणिया भाषा विच लिखणा , अपणिया भाषा दा साहित्य पढ़ना । मेरा मन्नणा एह है कि भगवान सिर्फ़ मातृभाषा विच कित्तिया गल्ला जो ही समझदा । असां प्रार्थना सिर्फ़ अपणिया ही भाषा विच करदे न ?.....अगर हल्ली तिकर कांगड़ी या पहाड़ी जो स्कूलां विच नी पढ़ाया जान्दा , तां असां घरे तां ग्लाई सकदे । सांजो चाहिदा कि असां बाज़ारे विच, अपणेयां मितरां, रिश्तेदारां कने ज़रूर अपणिया भाषा विच खुली के गल्ल करिए , तां जे पहलें लोक्कां विच समझ पैदा होएं कने इसा भाषा जो आधिकारिक दर्जा तौळा मिल्ले !
     
एह दिहियां कुछ प्रेरणा दैणे वाळियां गल्लां सुणी के मिंजो कने त्रिगर्ती होरां जो बड़ी तसल्ली मिल्ली ।मने विच आस भी जगी जे देर सवेर सैह ध्याड़ा ज़रूर औणा है जाह्लू कांगड़ी इक्क आधिकारिक भाषा हुणी हैअसां देयां स्कूलां , कॉलेजां विच बच्चेयाँ एह भाषा कतांबां विच पढ़नी है । औणे वाळे वक़्त विच क्या क्या कित्ता जाई सकदा , वर्तनी कने उच्चारण जो किहियाँ मानक बणाइए ... एह देह्या सोचदे-सोचदे असां वापस आई गे ।
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भूपेन्द्र जम्वाल 'भूपी'

Saturday, February 20, 2016

मिट्टी-सूना सब छडी चला गिया शायर-निदा फ़ाज़ली






'हर महाणुए होंदे हन दस-बीह महाणु, 
जिसयो भी दिखा  बार-बार दिखा।' 

8  फरवरी सोमवार  भ्यागा  अख़िरी साह लेणे वाळे शायर निदा फ़ाज़ली दी ताकत एही थी- सिधिया-सादिया  ज़ुआना तिन्हां दियां नज़्माँ कनै ग़ज़लाँ बार-बार पढ़ने दी  न्युन्दर दिन्दीयाँ थियां। तिन्हां दे अरथां ते अरथ  निकलदे जान्दे थे। उर्दूये   सादीया  ज़बानी वाळयां शायरां दी  कमी नीं है। डुघियाँ गल्लां गलाणे वाळे शायर भी भतेरे हन। अपर एह देही  शायरीया दी मसाल घट ही मिलदी। जेड़ी सिधी  हर कुसी दे  दिले उतरी  जाए कनै इतणी डु्घी  कि दमागे   देरा तिक  गूंजदी रैह। तिन्हां साही शायर ही लीखी  सकदा। 
'दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।'

अज जाह्लु सैह  दुनिया दा मिट्टी-सूना सब पिछें  छडी जाई  चुक्यो ता समकालीन अदब दी दुनिया किछ फिकी, किछ दुआस होई गईयो। बशक, गुलज़ार कनै कैफ़ी आज़मी साही निदा फ़ाज़ली जो  भी असली पछैण फ़िल्माँ ते ही मिली अपर  गुलज़ार साही निदा फ़ाज़ली दा क़द भी इसा पछेणा ते बडा था। सैह उर्दू दी तिसा तरक़्क़ी पसंद रवायत दा हिस्सा थे, जिन्नें अज़ादीया ते बाद बणदे हिंदुस्तान जो  तिसदा नोआं  मज़ाज दिता।  जिसा जो असां अक्सर गंगा-जमनी तहज़ीब गलाई  निपटाई दिंदे। तिसा तहजीब जो तोपणे वाळे, साधणे वाळे,  अपणे लीखणे तुआरने  वाळ्यां निदा फ़ाज़ली भी थे। इन्हां भाल कबीर वाळी  साधुक्कड़ी,  मीर साही सादग़ी, ग़ालिब दी  गहराई,  तुलसीदास दे अध्यात्म दे कनै-कनै फ़िराक़ दी कैफ़ियतां भी  मिली जान्दियाँ ता सरदार अली ज़ाफ़री दा चिंतन-विचारशीलता भी। ताईं ता इस विचारशीलता दे द्वंद्व तिन्हां लीखया-
'हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा,
मैं ही कश्ती हूं मुझी में है समंदर मेरा।'

हर घड़ी अप्पु नें ही उलझना है मुक़द्दर मेरा,
मैं ही किश्ती है मिंजो है समुदर मेरा।'

(हर घड़ी  रोणा बेला रोणा है...निदा फ़ाज़ली जो याद करी ने एह पढ़ा।)

दुनिया दे  जोड़-जमा दे ख़लाफ़ तिन्हां लीखया- 

'दो   दो जोड़ी हमेशा चार कुथु होंदे,
पढ़यां-लीखयां लोकां जो थोड़ी नदानी दे मौला।'

अपर  देहा भी नीं है कि निदा कोई असमानी ख्यालां डुब्बयो दुनिया ते लग्ग शायर नीं  थे। कि तिन्हां जो ज़माने दिया धूड़ी-मिट्टीया ने कोई लेणा-देणा ही नीं होअे। दरअसल निदा फ़ाज़ली दी शायरी देसे दी रूह कनै तिसा दे जिस्मे पर  पियो दाग़ बड़िया पीड़ा कनै  बोलदे। देसे होणे वाळे हिंदू-मुस्लिम फ़साद तिन्हां दियां  रचनां कई बरी ओन्दे हन। मगर हैरानी वाळी गल्ल एह  कि सैह टुटदे नीं। निदा अपणे अंदरलिया कुसी रूहानी कैफ़ियता ते अक्सर गाहं निकली ओन्दे। 1993 दे मुंबई दंगयां ते बाद तिन्हां जे नज़्म लीखी, तिसा लीखणे ताईं ईक बड़ा कलेजा चाही दा था। तिन्हां लीखया,
'उठ कपड़यां बदल,
घरे ते बाहर निकळ, 
जे होया सैह होया, 
राती ते  बाद दिन
अजे ते  बाद कल,
जे होया सैह होया 
जाह्लु तिक  साह् है,
भुख कनै त्रयाह है,
एही इतिहास है,
रखी ने  मूंह्डे पर हळ,
खेतरां जो  चल,
जे होया सैह होया...
जेड़ा मरया केहं मराया,
जे  जळया केहं जळया,
जेड़ा लुटोया केहं लुटोया,
मुद्दतां ते ग़ुम हन
इन्हां सुआलां दे  हल,
जे होया सैह होया।'

दरअसल एही चीज़ निदा जो बड़ा बणादीं। अपण्या दुखाँ ते ऊपर उठणे दा हुन्नर,  ज़माने दिया तकलीफा जो समझणे दा हुन्‍नर, इसा  सच्चाईया दी  पुख्ता पछेण कि भुख कनै प्यास दा सुआल ही असल है जिसदा हल मुंह्डे पर रखोये हळे ने जुड़या है। एह देहियां नज़्मां होर हन जिन्हां ते पता लगदा कि निदा दी शायरी दुखे  पर मनुष्यता दा कनै  प्रतिशोध दे विरुद्ध करुणा दा प्रतिपक्ष घड़दियां।
'
नहीं वह भी नहीं' ईक बड़ी मार्मिक नज़्म है जिसा   ईक मा दंगाइयां दी शनाख्त एह गल्ला ने करदी-

'नीं एह भी नीं 
'नीं एह भी नीं  
'नीं एह भी नीं,
सैह ता नां जाणे कुण थे
एह सारयां दे सारे ता मिंजो साही हन
सबनाँ दियां धड़कनां
निक्के निक्के चन्द्रमें रोशन हन
सब मिंजो साही वग्ते दिया 
भट्टीया दे लकड़ु हन
जिन्हाँ न्हेरिया राती
मेरी कुटिया बड़ी 
मेरीयां आंखीं सामणे    
मेरे बच्चे फूके थे    
सैह ता कोई होर थे 
सैह चेहरा ता कताहं हुण
ज़ेहन महफूज़ जज साहब 
अपर हां नेड़ें होये ता सींघि ने पछेणी  सकदी 
सैह तिस बणे ते आयो  थे          
जिथु दियां जनानां दियां गोदां च 
बच्चे नीं हसदे।'

दुर्भाग्य ने निदा देहे टेमें  गे जाह्लु असां दे वग्ते   नफ़रतां दा एह बण  बडा होन्दा जा दा, कठमुल्लेपणे दियां वहशी आंखीं  दुनिया जी  ईक लग ही चश्मे ने दिखणे दी ज़िद करा दियां। एह अग् किछ निदा दे हिस्सें भी आई। इबादत ताईं रोंदे याणे जो हसाणे वाळी तिन्हां दी सोच-तज़बीज़ कठमुल्ला ताक़तां जो रास नीं आई थी। अपर इसदे बावजूद तिन्हां दी शायरी इंसानियत दिया अग्गी पर पकीयो शायरी थी जिसा ने आखीं मेळने  फ़िरकापरस्त ताक़तां जो दिक़्क़त ओंदी थी। तिन्हां दे ढेर सारे अशआर हन जिनहां जो  बार-बार गलाणे दा मन करदा। अपर जाह्लु भी देह्या शायर ओंदा सै- आखर अपणे आपे किल्हा ही रही जांदा। कुसी मायूस घड़ीया तिन्हां लीखया-

'इस शहरे सैह मिंजो साही किल्हा होणा /
तिसदे दुश्मन हन मते सैह माह्णू खरा होणा।'

सैह बशक, खरे माह्णू थे, बोहत बड़ीया कलमा दे मालक थे कनै तिन्हां दी शायरीया दा अंगण इतण बड़ा था कि तिस दुश्मन भी आई जांदे थे, मितरां बदोलोर्इ जांदे थे।

प्रियदर्शन/एनडीटीवी 


तुसां दिया क़ब्रा पर मैं फ़ातिहा पढ़ना नीं  आया,
मिंजो पता था तुसां  मरी नी सकदे
तुसां दे दे मरने दी  सच्ची खबर जिन्नी डुआइयो थी, 
सैह झूठा था, सैह झूठा था.
सैह तुसां काहलु थे, कोई सुक्या पत्तर
होआ च पई ने टुट्या था.
तुसां दिया क़ब्रा पर जिन्नी तुसांदा दा नां लीखया,
सैह झूठा है , सैह झूठा है
तुसां दिया क़ब्रा च
मैं दफ़्न है
तुसां मिंजो च जिया दे हन।
काहल्की फ़ुरसत मिले, 
ता फ़ातिहा पढ़ना आई जानयो।
निदा फ़ाज़ली होरां एह नज़्म अपणे पिता होरां दे नीं रेहणे पर गल्ला थी।

पहाड़ी दयार दी विनम्र श्रधांजली

पहाड़ी अनुवाद - कुशल कुमार